[Poem] किसान की किसानीयत
ये रक्त है... जो सुर्ख है... जो लाल है...
इस खून में यूँ ही नहीं उबाल है...
कुछ रंग था उस जंग का...
वहीं रंग है इस जंग का...
कुछ लड़ी थी सरहदों पर...
आज भी लड़ी जा रहीं है सरहदों पर...
बन्द कमरों मे कुछ काग़ज़ों से जमीनी नाप ले गए...
ना नाप पाए किसान का सम्मान...
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रक्त था जवान का...
रक्त है किसान का...
मोल ना लगा था यूँ...
मोल ना लगेगा यूँ...
ना इंच एक हिला था तब,
ना इंच एक हिला हूँ अब...
माहौल सर्द है का...
उबाल है विचार का...
कौम से किसान हूँ ...
ज़मीर से जमीन हूँ...
देश का यकीन हूँ...
किसान की किसानीयत सा ये वक़्त मैं गम्भीर हूँ...
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