सातुड़ी तीज - सत्तू सी धाई के सुहाग से धाई

सातुड़ी तीज - सत्तू सी धाई के सुहाग से धाई


इस दिन के आने की आहट का एहसास कुछ अलग था...
इस दिन के होने का ज़ज्बात कुछ अलग था...
अधराते से हुए दिन की शुरूवात, चंदा दिखाई पर रुकनी थी...
पूरे दिन जीवन साथी के हाल जानने का एहसास अलग ही था... 
चन्दा कुछ रूठा यूँ था, की बदरा में छुपा वो था...
बदरा चंदा की कशमकश का एहसास कुछ अलग था... 
सत्तू से जो व्रत खुलनी थी... निकले जब सत्तू के सात ग्रास...
हर निवाले का भाव कुछ अलग ही था...
हर निवाले का ज़ज्बात कुछ अलग ही था...
हर निवाले के साथ पूछे प्रश्न का एहसास ही अलग था...
सत्तू सी धाई के सुहाग से धाई...

और हर बार प्रश्न का उत्तर सुन मन का भाव कुछ और ही था... 
"सुहाग से नी धाई, सत्तू से धाई"

Comments

  1. Amazing to see that you can write with great emotions. Love you Darling.

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