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[Poem] हाँ, कहीं जिंदा हूँ मैं...

हाँ, कहीं जिंदा हूँ मैं...  किसी के ग़म में, गुम हो जाऊँ... हाँ, जिंदा हूँ मैं...  किसी की खुशी मैं, खिलखिला जाऊँ... हाँ, जिंदा हूँ मैं...  नवजात की किलकारी से आंखे भर आए... हाँ, जिंदा हूँ मैं...  किसी रिश्ते के दूर हो जाने से, रिक्त स्थान बना रहे... हाँ, जिंदा हूँ मैं...  किसी की जीवन चक्र संपूर्ण हो, और सहानुभूति का भाव आता रहे... हाँ, जिंदा हूँ मैं...  राह पर चलते किसी पत्थर को हटा देना, सम्वेदना के स्पन्दन होता रहे... हाँ, जिंदा हूँ मैं...  जीवन का इस प्रकृति के हर कण से, हर एक भाव से करुणा बनी रहे... हाँ जिंदा हूँ मैं...  इन पंक्तियों से तुम्हारे मनःस्थिति पर हलचल कर जाऊँ... हाँ जिंदा हूँ मैं... ~ आशीष ~

[Poem] कहानी कान की...

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कहानी कान की...  पहले जनेऊ थी... जो कान पर लमूट लिया करती थी... फिर ऐनक आयी... जो कानों पर ठहरा करती थी... कुछ हुआ यूँ कि headphones 🎧 ने अपनी जगह ली... इतना सब ठीक था...  कान ने भी कहा कि मैं तो साइड में था भाई तब भी इतना बोझा... सामने होता तो क्या हाल करते...  इतना ही कहना हुआ था कि दो डोरीयां आयी और अब आकर सध गयी...  और बोली... दोस्त तुम ना होते तो शायद मैं मेरे आका की जिंदगी ना बचा पाता...  #wearmask   ~ आशीष ~  

[Thoughts] परिवार की परिभाषा क्या है?

परिवार ? वो जो कि जिंदगी के बाद म्रत्य काया के पास ना बेठे,  बल्कि , पहले दुःख सुख मे साथ बेठे,  चाहे करीब हो या दूर , कुछ पल सुकून के लगने लगे,  वो परिवार ही है | -- आशीष  --

[Thoughts] म्रत्यु

"म्रत्यु" म्रत्यु एक अंत नहीं,  आरम्भ है... कुछ अनंत काल के अनसुलझे समीकरणों का, कुछ क्षितिज पर बुने नए समीकरणों का,  इस आस से की वो सुलझेगे "आशीष"

[Poem] किसान की किसानीयत

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ये रक्त है... जो सुर्ख है... जो लाल है... इस खून में यूँ ही नहीं उबाल है...  कुछ रंग था उस जंग का...  वहीं रंग है इस जंग का...  कुछ लड़ी थी सरहदों पर...  आज भी लड़ी जा रहीं है सरहदों पर...  बन्द कमरों मे कुछ काग़ज़ों से जमीनी नाप ले गए...  ना नाप पाए किसान का सम्मान... ----------------------------------------- रक्त था जवान का...  रक्त है किसान का...  मोल ना  लगा था यूँ...  मोल ना लगेगा यूँ...  ना इंच एक हिला था तब,  ना इंच एक हिला हूँ अब...  माहौल सर्द है का...  उबाल है विचार का...  ...

[Thoughts] केसरिया

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केसरिया   प्रेम का रंग है केसरिया... प्रेमी के संग है केसरिया...  जंग का रंग केसरिया... वीरता का प्रमाण केसरिया... बलिदान का रंग केसरिया...  भोर का पहला स्पंदन केसरिया... सूर्य की पहली किरण केसरिया... करवा चौथ का चाँद केसरिया...  गाजर के हलवे मे केसरिया... पीले चावल मे केसरिया...  केसरिया एक रंग नहीं... एक भावना है... एक एहसास है... एक प्रमाण है... 

[Thoughts]: जीवंत प्रेरणा

  🤓 "जीवंत प्रेरणा" 🤓 कर गयी दस्तक मेरे चरित्र पर, कुछ ठहर सा गया था जीवन, वक़्त की धीमी रफ्तार ने, कुछ एसा झोंका दिया... कुछ आहट हुई... कुछ हलचल हुई... मानो कुछ शांत जल स्रोत मे कुछ हल्की तरंगे उठी... समझ आने लगे जीवन के कुछ किस्से... कुछ अनछुए हिस्से... मेरी " जीवंत प्रेरणा " के स्रोत से जो अनुभव मिले हर कदम पर साथ देते रहे... एसा लगा चल मैं रहा हूँ गति वो दे रहे हैं... लड़खड़ा में रहा हूँ... बैसाखी वो बन रहे हैं... 🙂 गुपचुप से दस्तक देकर, दस्तख़त के पन्नों के पीछे छुपा उभार मैं हूँ... 🙂 ये " जीवंत प्रेरणा " सम्मान है... जो दस्तख़त की प्रतिलिपि आजतक समय मे धूमिल ना हुई... ❤️❤️❤️